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सा विद्या या विमुक्तये : डॉ0 प्रबोध कुमार मिश्र

इतिहास को विकृत करने के परिणाम घातक होंगे : डॉ० प्रबोध

*तू कहता कागज लेखी , मैं कहता आँखन देखी*—-।

आरा। आज इतिहास का राजनीति करण भी हो रहा है। इतिहास एक बड़ा ही संवेदनशील विषय हो गया है। साथ ही भारतीय इतिहास के कई विषय काफी विवादास्पद हैं, इन अध्यायों को बड़ी कुशलता, शालीनता और सूझबूझ से पढ़ाना होता है ताकि किशोरावस्था के विद्यार्थियों पर कोई पूर्वाग्रह का भाव न आये।टाउन स्कूल आरा के शिक्षक प्रबोध कुमार मिश्र से हुई साक्षात्कार मे उन्होंने कहा कि आप देख सकते हैं कि मामला बाबरी का हो, ज्ञानवापी का या फिर दिल्ली के पुराने किले का, सारा देश और देश का न्यायिक एवं प्रशासनिक तंत्र इतिहासकार की ओर उम्मीद से देखता है और उससे नीर – क्षीर न्याय की अपेक्षा रखता है।ऐसे में इतिहास के अध्ययन और अध्यापन की संवेदनशीलता का अंदाजा खुद ही लगाया जा सकता है।उन्होंने कहा कि इतिहास जैसे तथाकथित नीरस विषय को सरस बनाना भी अपने आप में एक चुनौती होती है। दशम वर्ग तक अमूमन सभी बच्चों को बताया जाता है कि बेटा इस वर्ष तक किसी प्रकार मन मार के इतिहास पढ़ ले।इस कारण यह विषय कुपोषण का शिकार हो जाता है पर जब छात्र उच्च शिक्षा की ओर मुखातिब होता है तो पता चलता है कि चपरासी से लेकर अफसर तक की परीक्षा बिना इतिहास विषय के पोषण के संभव ही नहीं। उन्होंने बताया कि कैथोलिक उच्च विद्यालय आरा और डी ए वी पब्लिक स्कूल, दानापुर से होते हुए आचार्य शिवपूजन सहाय की तप:स्थली और बाबू जगजीवन राम की कर्मस्थली रह चुके टाउन उच्च माध्यमिक विद्यालय, आरा की उर्वर भूमि पर शिक्षण के कब दो दशक पार हो गए, पता ही नहीं चला।सरकारी विद्यालय से मेरा छात्र या शिक्षक किसी भी रूप में पहला साक्षात्कार टाउन स्कूल में ही हुआ। दम फूलती हुई शिक्षण व्यवस्था और थक कर बैठ जाने को आतुर भवन के शतायु खंभे एक विचित्र सी तस्वीर मन मस्तिष्क में उकेर रहे थे।मन पुनः सुसज्जित विद्यालय में वापस जाने को  व्याकुल हो रहा था परंतु बेहतर भविष्य की उम्मीद और कुछ नया कर गुजरने की अन्त:सलिला फल्गु के समान मन में उमड़ रही भावना ने यहीं रोक लिया। इतिहास विषय के उच्च माध्यमिक शिक्षक के रूप में मैंने अपने दायित्वों का निर्वहन शुरू किया।डॉ प्रबोध ने इतिहास विषय में डॉक्टरेट की उपाधि ग्रहण की और इनके करीब  दर्जन भर शोध पत्र राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। परंतु वर्ग में अध्यापन करते हुए मैंने पाया कि जिस हवाई स्तर की योजना ले कर मैं बैठा हूँ उससे न मेरे विद्यार्थियों का कल्याण होगा और न ही मेरा शिक्षण फलीभूत होगा। कहीं “ऑल गुड स्कॉलर्स आर नॉट गुड टीचर्स” वाली बात न चरितार्थ हो जाये। तब मैंने अपने अध्यापन को अपने छात्र- छात्राओं के लिए सहज, सुगम और सुग्राह्य बनाने की शुरुआत की। उनके माध्यमिक स्तर के ज्ञान में जो कमियाँ रह गयीं थी उसको ब्रिज करने की कोशिश की। इधर +2 का इतिहास का पाठ्यक्रम भी राष्ट्रीय मानक और एनसीएफ के अनुरूप था, सो उसका मान भी बना रहे यह भी समीचीन था। इन्ही रपटीली राहों पर अपने ज्ञान और अनुभव का पाथेय ले कर मैंने अपनी शिक्षण यात्रा शुरू की।उन्होंने कहा कि इतिहास विषय के अध्यापन हेतु मानचित्रों का प्रयोग, सप्रसंग और संदर्भ के अनुरूप अतिरिक्त घटनाओं का उद्धरण काफी लाभदायक साबित हुआ। साथ ही जैसा कि इतिहासकार इ एच कार ने कहा है – “हिस्ट्री इज द कन्टिन्यूअस डायलॉग वीटवीन द पास्ट एण्ड द प्रेर्जेंट”, पढ़ाने के दौरान अगर इतिहास के प्रसंगों को वर्तमान से जोड़ के बताया जाए तो युवा विद्यार्थियों के लिए ज्यादा सुगम्य और हितकारी होता है। कहा जाता है साधना कभी निष्फल नहीं होती। उन्होंने कहा कि सेवा भाव से किये गए विद्यादान के फलस्वरूप ही “माता मुंडेश्वरी मंदिर “से संबंधित इनका शोध- पत्र’ भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस’ के 78वें अधिवेशन में प्रकाशित हुआ, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी और इसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विद्वानों का ध्यान इस ऐतिहासिक स्थल की ओर आकृष्ट हुआ।बताते चले कि डॉ० प्रबोध कुमार मिश्र एम० ए०, पीएच० डी० , बी० एड०, एम० बी० ए० (नई दिल्ली), डी० -इन- इंग्लिश (इ० एफ० ल० यू०, हैदराबाद), ईo आई o कॉउन्सलर (आईo सीo एफo, यूo एसo एo) से डिग्री हासिल कर वर्तमान मे भोजपुर जिले के आरा मुख्यालय स्थित टाउन स्कूल मे शिक्षक के पद पर कार्यरत हैं।

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